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किसी नवयवना-सी रक्ताभ हो आई वह। एक चिर-प्रतीक्षित मुलाकात की कल्पना से ही मन में हजारहा इंद्रधनुष झिलमिला उठे। हवा सीटियां मार रही थी...

डायरेक्ट फ्लाइट

फ्लाइट सुबह सात बजे की थी। कैब पांच बजे आ गई।

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कैब के ड्राइवर ने जब कॉल करके अपने पहुंचने की सूचना दी, वह लगभग तैयार हो चुकी थी। बस आखिरीबार अटैची में रखे सामानों की फेहरिश्त के बाबत एक-एक कर याद करने की मुद्रा में सोचा, फिर कुछ छूट रहा हो, जब ऐसा कुछ याद नहीं आया तो सिर को हल्का झटका देती रूम से बाहर निकल आई। हालांकि एक बार को इच्छा हुई कि पति को जगाकर अपने जाने की सूचना दे दे। लेकिन चुपचाप निकल जाने का रोमांच खत्म नहीं करना चाहती थी, लिहाजा बेआवाज दरवाजा बंदकर लिफ्ट की ओर बढ़ गई।

बिल्डिंग उनींदी थी। वाचमैन अपने रेस्टरूम में जम्हाइयां ले रहा था। उस पर  नजर पड़ते ही भागा हुआ बाहर आया और गुड मॉर्निंग बोलकर गेट खोलने लगा। कैब गेट के ऐन सामने खड़ी थी। ड्राइवर ने आगे बढ़कर अटैची ले ली। मुड़कर देखा, पीछे बिल्डिंग में कोई जुंबिश नहीं थी, होंठो पर एक बेरंग मुस्कान तिर गई। अटैची डिक्की में रखकर ड्राइवर उसके बैठने का इंतजार करने लगा। वाचमैन दाहिने हाथ की हथेली अपने माथे से लगाकर सलामी दे रहा था। बिना किसी प्रतिक्रिया के वह कैब की पिछली सीट पर जा बैठी। यह सब कुछ बेहद खामोश और लगभग रोबोटिक था।

कैब चली तो लंबी सांस फेफड़ों में भरते हुए खिड़की के पार देखा, सामने जमीन से आसमान तक कोई शफ्फाक धुली चादर सूखने के लिए अलगनी पर फैली थी, हवा के हल्के झोंकों से उसमें बल पड़ते और वलय बनती जाती। उसे याद नहीं, ऐसा मंजर कब देखा था? मंद-मादक हवा, मलमली सुबह, भीतर तक उमग आई उजास...बेखुदी का आलम ऐसा कि कोई खुमारी-सी थी, जो टूटने का नाम नहीं ले रही थी।  

गोवा के लिए इस वक़्त यह एकमात्र डायरेक्ट फ्लाइट थी। अगर सबकुछ ठीक रहा तो वह दस बजे तक गोवा पहुंच जाएगी। इतनी जल्द! दिल धक कर गया...महज तीन घंटे बाद...वे दोनों आमने-सामने होंगे। वे दोनों यानी रागिनी और अधीर। किसी नवयवना-सी रक्ताभ हो आई वह। एक चिर-प्रतीक्षित मुलाकात की कल्पना से ही मन में हजारहा इंद्रधनुष झिलमिला उठे। हवा सीटियां मार रही थी...कैब सड़क किनारे दूर तक चले गये सिलसिलेवार अमलतास के वृक्षों पर खिले पीले फूलों के शामियाने से गुजर रही थी। इन पुलकभरे पलों में मन-प्राण निर्बंध उड़ा जा रहा था। पति को अपने प्रस्थान की सूचना की औपचारिकता भी टाल गई थी। 

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बोर्डिंग पास, सेक्योरिटी चेक और चेकइन की अफरा-तफरी से उबरने के बाद प्रतीक्षा लाउंज में बैठकर व्हाट्सएप मैसेज किया- ‘आप सोए थे, इसलिए डिस्टर्ब नहीं किया। एक दोस्त से मिलने गोवा जा रही हूं। पहुंच कर फोन करूंगी।' 

कौन दोस्त, कहां रुकेगी, कब लौटेगी...कुछ नहीं। 

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