एपिसोड 1

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वाह खूब, आप भी रोए और मुझको भी रुलाया। जिसके हाथ में किताब पहुँची उसे मैंने देखा मगर उसका हाल कहने का कुछ मौका तो मिला नहीं, तुम पहले से ही रोने लगे।

तिलिस्मी किताब गायब है 

बयान - 1

वह नाजुक औरत जिसके हाथ में किताब है और जो सब औरतों के आगे-आगे आ रही है, कौन और कहाँ की रहने वाली है, जब तक यह न मालूम हो जाए तब तक हम उसको वनकन्या के नाम से लिखेंगे।

धीरे-धीरे चल कर वनकन्या जब उन पेड़ों के पास पहुँची जिधर आड़ में कुँवर वीरेंद्र सिंह और फतह सिंह छिपे खड़े थे, तो ठहर गई और पीछे फिर के देखा।

इसके साथ एक और जवान, नाजुक तथा चंचल औरत अपने हाथ में एक तस्वीर लिए हुए चल रही थी जो वनकन्या को अपनी तरफ देखते देख आगे बढ़ आई। वनकन्या ने अपनी किताब उसके हाथ में दे दी और तस्वीर उससे ले ली।

तस्वीर की तरफ देख लंबी साँस ली, साथ ही आँखें डबडबा आईं, बल्कि कई बूँद आँसुओं की भी गिर पड़ीं। इस बीच में कुमार की निगाह भी उसी तस्वीर पर जा पड़ी, एकटक देखते रहे और जब वनकन्या बहुत दूर निकल गई तब फतहसिंह से बातचीत करने लगे।

कुमार – ‘क्यों फतह सिंह, यह कौन है कुछ जानते हो?’

फतह सिंह - ‘मैं कुछ भी नहीं जानता मगर इतना कह सकता हूँ कि किसी राजा की लड़की है।’

कुमार – ‘यह किताब जो इसके हाथ में है जरूर वही है जो मुझको तिलिस्म से मिली थी, जिसको शिवदत्त के ऐयारों ने चुराया था, जिसके लिए तेज सिंह और बद्रीनाथ में बदाबदी हुई और जिसकी खोज में हमारे ऐयार लगे हुए हैं।’

फतह सिंह - ‘मगर फिर वह किताब इसके हाथ कैसे लगी?’

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कुमार – ‘इसका तो ताज्जुब हुआ है मगर इससे भी ज्यादा ताज्जुब की एक बात और है, शायद तुमने ख्याल नहीं किया।’

फतह सिंह – ‘नहीं, वह क्या?’

कुमार – ‘वह तस्वीर भी मेरी ही है जिसको बगल वाली औरत के हाथ से उसने लिया था।’

फतहसिंह - ‘यह तो आपने और भी आश्चर्य की बात सुनाई।’

कुमार – ‘मैं तो अजब हैरानी में पड़ा हूँ, कुछ समझ ही नहीं आता कि क्या मामला है। अच्छा चलो पीछे-पीछे देखें ये सब जाती कहाँ हैं।’

फतहसिंह - ‘चलिए।’

कुमार और फतहसिंह उसी तरफ चले जिधर वे औरतें गई थीं। थोड़ी ही दूर गए होंगे कि पीछे से किसी ने आवाज दी। फिर के देखा तो तेजसिंह पर नजर पड़ी। ठहर गए, जब पास पहुँचे उन्हें घबराए हुए और बदहोशो-हवास देख कर पूछा - ‘क्यों क्या है जो ऐसी सूरत बनाए हो?’

तेजसिंह ने कहा - ‘है क्या, बस हम आपसे जिंदगी भर के लिए जुदा होते हैं।’

इससे ज्यादा न बोल सके, गला भर आया, आँखों से आँसुओं की बूँदे टपाटप गिरने लगीं। तेजसिंह की अधूरी बात सुन और उनकी ऐसी हालत देख कुमार भी बेचैन हो गए, मगर यह कुछ भी न जान पड़ा कि तेजसिंह के इस तरह बेदिल होने का क्या सबब है।

फतहसिंह से इनकी यह दशा देखी न गई। अपने रूमाल से दोनों की आँखें पोंछीं, इसके बाद तेजसिंह से पूछा - ‘आपकी ऐसी हालत क्यों हो रही है, कुछ मुँह से तो कहिए। क्या सबब है जो जन्म भर के लिए आप कुमार से जुदा होंगे?’

तेजसिंह ने अपने को सँभाल कर कहा - ‘तिलिस्मी किताब हम लोगों के हाथ न लगी और न मिलने की कोई उम्मीद है इसलिए अपने कौल पर सिर मुंड़ा के निकल जाना पड़ेगा।’

इसका जवाब कुँवर वीरेंद्रसिंह और फतहसिंह कुछ दिया ही चाहते थे कि देवीसिंह और पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी भी घूमते हुए आ पहुँचे। ज्योतिषी जी ने पुकार कर कहा - ‘तेजसिंह, घबराइए मत, अगर आपको किताब न मिली तो उन लोगों के पास भी न रही, जो मैंने पहले कहा था वही हुआ, उस किताब को कोई तीसरा ही ले गया।’

अब तेजसिंह का जी कुछ ठिकाने हुआ। कुमार ने कहा - ‘वाह खूब, आप भी रोए और मुझको भी रुलाया। जिसके हाथ में किताब पहुँची उसे मैंने देखा मगर उसका हाल कहने का कुछ मौका तो मिला नहीं, तुम पहले से ही रोने लगे।’ इतना कह के कुमार ने उस तरफ देखा जिधर वे औरतें गई थीं मगर कुछ दिखाई न पड़ा।

तेजसिंह ने घबरा कर कहा - ‘आपने किसके हाथ में किताब देखी? वह आदमी कहाँ है?’

कुमार ने जवाब दिया - ‘मैं क्या बताऊँ कहाँ है, चलो उस तरफ शायद दिखाई दे जाए, हाय विपत-पर-विपत बढ़ती ही जाती है।’

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आगे-आगे कुमार तथा पीछे-पीछे तीनों ऐयार और फतहसिंह उस तरफ चले जिधर वे औरतें गई थीं, मगर तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी हैरान थे कि कुमार किसको खोज रहे हैं, वह किताब किसके हाथ लगी है, या जब देखा ही था तो छीन क्यो न लिया।

कई दफा चाहा कि कुमार से इन बातों को पूछें मगर उनको घबराए हुए इधर-उधर देखते और लंबी-लंबी साँसें लेते देख तेजसिंह ने कुछ न पूछा। पहर भर तक कुमार ने चारों तरफ खोजा मगर फिर उन औरतों पर निगाह न पड़ी। आखिर आँखें डबडबा आईं और एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

तेजसिंह ने पूछा - ‘आप कुछ खुलासा कहिए भी तो कि क्या मामला है?’

कुमार ने कहा - ‘अब इस जगह कुछ न कहेंगे। लश्कर में चलो, फिर जो कुछ है सुन लेना।’

सब कोई लश्कर में पहुँचे। कुमार ने कहा - ‘पहले तिलिस्मी खँडहर में चलो। देखें बद्रीनाथ की क्या कैफियत है।’ यह कह कर खँडहर की तरफ चले, ऐयार सब पीछे-पीछे रवाना हुए। खँडहर के दरवाजे के अंदर पैर रखा ही था कि सामने से पंडित बद्रीनाथ, पन्नालाल वगैरह आते दिखाई पड़े।

कुमार – ‘यह देखो वह लोग इधर ही चले आ रहे हैं। मगर हैं, यह बद्रीनाथ छूट कैसे गए?’

तेजसिंह – ‘बड़े ताज्जुब की बात है।’

देवीसिंह – ‘कहीं किताब उन लोगों के हाथ तो नहीं लग गई। अगर ऐसा हुआ तो बड़ी मुश्किल होगी।’

फतहसिंह - ‘इससे निश्चिंत रहो, वह किताब इनके हाथ अब तक नहीं लगी। हाँ, आगे मिल जाए तो मैं नहीं कह सकता, क्योंकि अभी थोड़ी ही देर हुई है वह दूसरे के हाथ में देखी जा चुकी है।

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