एपिसोड 1

453 पढ़ा गया
0 கருத்துகள்

हमने किसी रात चमकती अशर्फियों, उड़ती परियों या राजा-रानी का सपना नहीं देखा। हाँ, इस मासूम-सी गुमटी की बदौलत किसी तरह बचे-खुचे दिनों के दुख ख़त्म हो जाने की असीस हम परमात्मा से ज़रूर मांगते थे।

गुमटी

जहाँ ढाई हज़ार फीट लगभग लम्बी लेकिन बहुत साधारण-सी वादी ख़त्म होती है, वहाँ से लगभग पचास क़दम बाद की ढलान पर यह तिराहा है। बहुत एकान्त और अनाकर्षक तिराहा। इस जगह से कभी-कभी एक-दो मोटरें, एक-दो घंटे का अंतर देकर बसें, चरमराती बैलगाड़ियाँ और किसी बस्ती को पास के बाज़ार से लौटते साइकिल सवार रोज़मर्रा आते-जाते रहते हैं। इसीलिए यह तिराहा बहुत एकांत और अनाकर्षक है। इसके इर्द-गिर्द कोई जानदार बस्ती नहीं है। घाट वाले रास्ते को काटकर तिराहा बनाने वाली सड़क के कोने में एक भूरी-सी गंजी टेकरी है। बिल्कुल सपाट बंजर और बांझ टेकरी। वह भी मिट्टी की, पत्थर की नहीं। हाँ, उसके अगल-बग़ल ज़रूर कुछ छोटे-छोटे जमे हुए पथराव हैं। एक सड़क महोबे की तरफ और घाट वाली छतरपुर की तरफ़ चली गयी है। वैसे आगे जाकर इस सड़क से थोड़ी दूर पर कई रास्ते फूट जाते हैं।

आज इधर से आने-जाने वाले लोगों को इस तिराहे पर रुकने का कोई लालच नहीं है। तीन-चार मील दूर तक बस ढाक और रेंड के जंगल। मीलों फैला जंगल। कहीं भी खेत नज़र नहीं आते,  किसी वस्तु के पीछे कोई चमकता इतिहास नहीं। पर उस भूरी टेकरी के नीचे ठीक कोने पर घटे हुए जीवन का एक बहुत ही लघुकालिक इतिहास है। उस फ़ौज से भागे आदमी का इतिहास। पूस की कड़क रात में ग्राहकों की ख़ातिर भीगते हुए मीलों दौड़ने-भागने का दृश्य, उस छोटे-से व्यापार की तड़प और सबसे बाद एक ठिठुरती मौत का करुण चित्र। सामबहादुर को आज इन अपेक्षाकृत अच्छे दिनों में भुला सकना मेरे लिए संभव नहीं हो सका।

उस कोने पर एक गुमटी थी। मेरी और सामबहादुर की गुमटी। पर वह गुमटी वैसी नहीं थी जैसी कि आमतौर पर होती हैं। वह बड़ी ग़रीब और मेहनत से बनाई गई गुमटी थी। यहाँ पर मोटर वाले अमीर और ढोर चराने वाले ग़रीब मौका पड़ने पर चाय पी लिया करते थे। सामबहादुर के बेडौल हाथों की चाय, जिसको पिलाने के बाद वह कभी किसी को मुस्कुराकर सलूट करना नहीं भूला। सामबहादुर आज की दुनिया का आदमी न था। जब टौलागंज नेपाल में उसके खेत क़र्ज़ के बोझ से बिक गये तो वह अपनी औरत को छोड़ कर हिन्दुस्तान भाग आया था। बहुत दिन इधर-उधर भटकने के बाद वह मेरठ छावनी में सिपाही बन कर भरती हो गया। यह दूसरी बड़ी लड़ाई का समय था।

पढ़िए यह कहानी Bynge पर
जुड़िए 3 लाख+ पाठकों के समूह से

Bynge इंस्टॉल करें

लेकिन लड़ाई खत्म होने से पहले ही बहुत सारे सिपाही हिन्दुस्तान लौटे उनमें सामबहादुर भी था। मेरठ आते ही वह वहाँ से किसी तरह भी भागने की फ़िराक़ में लगा रहा क्योंकि यह फ़ौजी ज़िन्दगी उससे निभने की नहीं।

मुझे वह भेंट अच्छी तरह याद है। सहारनपुर जेल से छूटकर मैं मीलों भागा, जैसे मुझे कोई पकड़ लेगा और फिर स्टेशन...।

हाँ, अच्छी तरह याद है कि वह देहरादून एक्सप्रेस ही थी। बड़े से डिब्बे के एक कोने में सबसे अलग दुबका हुआ मैं। गाड़ी की रफ़्तार पूरी तेज़ी पर थी। डब्बे की ठंड और रुआंसी-सी बत्तियों की रोशनी में सब सम्मोहित और सोये हुए। बाहर के अंधेरे घुप्प में चुराई निराश दृष्टि गड़ाता रहा। मेरा रास्ता अंधेरे में ही था और  मैं उसे खोद-खोज रहा था।

मेरा कोई नहीं। अब कहाँ जाऊँगा? फिर घुटनों को सीने से भींचकर नींद खींचता रहा। पर ठंड और नींद का रिश्ता निकट नहीं आया। फिर एक झपकी और उसका खटके से टूटना। तब रेलगाड़ी कहीं रुकने के बाद नये सिरे से रेंगती हुई खिसक रही थी। मुझे लम्बे-चौड़े कोट में लिपटे एक आदमी को अपनी बग़ल में बैठे देख अच्छा नहीं लगा। डब्बे में काफी जगह थी। फिर भी मेरे बग़ल वाला वह आदमी बहुत मीलों तक अपने को छुपाता रहा। और उसके पास एक खाकी-सा कम्बल देख-देख मेरे शरीर की ठंड बढ़ती रही। इसके बाद दिल्ली से कुछ पहले ही हम दोनों धीरे-धीरे खुल गए। और मुझे उसके खाकी कम्बल को लपेट गर्मी पाने का सुख भी मिला। वह मेरठ छावनी से रात के चुपचाप में घबड़ाकर भागा हुआ पहाड़ी सामबहादुर था। फिर मेरे न चाहते हुए भी दुख और अनिश्चित भविष्य के अन्धेरे कपाटों ने हमें आपस में प्रगाढ़ कर दिया।

उसके बाद कुछ दिनों तक मैं और सामबहादुर दोनों हार्डिंग सराय और पचकुइयां रोड पर डबलरोटी और लेमनचूस बेचा करते थे। सामबहादुर के पास उस ओवरकोट और कम्बल के अलावा सातेक रुपये भी थे। और मेरे हाथों को जेबों की बहुत उधेड़बुन करने के बाद भी टूटते सूतों के अलावा और कुछ न मिलता। फिर भी कुछ दिनों तक डबलरोटी और लेमनचूस बेच-बाच कर हम दोनों किसी भी प्रकार अपना पेट पालते रहे। पर बहुत जल्दी ही वह सातेक रुपयों वाली पूंजी भी चुक गई और यह सब कुछ चल न सका तो नौकरी करने की फ़िकर हुई। पर हम सरीखे ख़ानाबदोशों को उस समय की परेशान और अस्तव्यस्त दिल्ली में कोई नौकरी मिलना मुमकिन नहीं हुआ। उस समय तो बस फ़ौजी तरह की नौकरियां ही आसानी से मिल जाती थीं। फिर भी सामबहादुर को बराबर यह डर बना रहा कि कहीं वह फिर न पकड़ लिया जाए। वह भागा हुआ जो है। बीस-बाइस दिनों में ही हमने दिल्ली छोड़ दी।

पढ़िए यह कहानी Bynge पर
जुड़िए 3 लाख+ पाठकों के समूह से

Bynge इंस्टॉल करें

दिल्ली छोड़ने के बाद भूखी आत्मा का बोझ ज़िन्दगी के लड़ैते मोह पर लादे हम इधर-उधर घूमते रहे। दो महीने से ऊपर झांसी और सतना में कुलीगिरी की। फिर इस तिराहे पर चाय की गुमटी खोलने की हिम्मत हमने कर डाली। इस निर्णय पर हम लोग बड़ी मुश्किल से पहुँच पाए थे, क्योंकि पैसे के मामले में हमारे जेब पूरे निठल्ले थे। लेकिन गुमटी बनाने में पैसे की बात हमारे सामने नहीं आई। हाँ, मेहनत और पसीने का भाव बहुत ऊंचा रहा।

पांच-छह दिनों में जाके गुमटी बनने का काम शुरू हुआ था। ढाक वन के उन धूप टन्नाते दिनों की याद अभी ग़ायब नहीं हुई है। पत्थर ढोते हम हांफ जाते, लेकिन किसी लापता आस के कारण हमारी आंखों में आशा नहीं चुकती थी। सामबहादुर पहाड़ी स्नेह से मेरे माथे की चुहचुहाअट पोंछता हुआ मुझे किसी छितरी छाया के नीचे बिठा देता; मेरे लाख नकारने के बावजूद भी। रात को जेठ की गरम चांदनी में उमस के मारे जब भूखी नींद तलफलाती और सूखे पत्तों की विचित्र आहट में करवट बदलता हुआ मैं फ़क से आंख खोल देता  तो सामबहादुर बग़ल में न दिखता। थोड़ी देर बाद टेकरी के शेड से बोझीली चाल में छोटे-छोटे पत्थरों की सिल्लियां ढोता आता। उस समय सामबहादुर की भक्ति में गदगदाकर चुपचाप पत्थर लाने के लिए मैं स्वयं भी ढलान में उतर जाता। थोड़ी दूर जाना पड़ता था। जब लौटता तो सामबहादुर आराम करता होता और मुझसे सोने के लिए बोलता।

हमने किसी रात चमकती अशर्फियों, उड़ती परियों या राजा-रानी का सपना नहीं देखा। हाँ, इस मासूम-सी गुमटी की बदौलत किसी तरह बचे-खुचे दिनों के दुख ख़त्म हो जाने की असीस हम परमात्मा से ज़रूर मांगते थे। सामबहादुर को अक्सर करके उस पथरीली गुमटी में एक सपना आता। उसकी दुकान के सामने से आज़ादी का जुलूस जा रहा है। उस सवेरे वह अपने मोटे सुर में कुछ गुनगुनाता रहता। कोई पहाड़ी धुन। मैं परेशान होता कि सामबहादुर केतली, चाय, गिलास और दूध चीनी आदि के लिए कैसे इन्तज़ाम करेगा। पर टोकने पर हर बार सामबहादुर ने न जाने किस आशा से मुझे हमेशा टाल दिया।

अगले एपिसोड के लिए कॉइन कलेक्ट करें और पढ़ना जारी रखें