एपिसोड 1

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अनुक्रम 
एपिसोड 1-4 : रंगमंच
एपिसोड 5-6 : स्वेटर
एपिसोड 7-10 : मन्नन राय गजब आदमी हैं
एपिसोड 11-13 : चश्मे 
एपिसोड 14-15 : डर 
एपिसोड 16-24 : सोमनाथ का टाईमटेबल
एपिसोड 25-26 : सिगरेट 
एपिसोड 27-28 : सफ़र
एपिसोड 29-35 : एक शून्य शाश्वत

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“तो क्या तुम लोग सिर्फ़ लड़कियां देखने जाते हो ? नाटक अच्छा हो बुरा, अभिनय किस स्तर का है, प्रकाश, मंच, संगीत कैसा है, इससे तुम्हें कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता ?"

कहानी: रंगमंच

नाटक

पांच बजे ही वह श्रीराम सेंटर पहुंच गया। हालांकि शो साढ़े दस बजे से था, पर उसे चैन नहीं था। आज के दिन का वह बड़ी बेसब्री से पिछले एक हफ़्ते से इंतज़ार कर रहा था। कैसे उसने ये सौ रूपये बचाए थे, यह वही जानता था। पांच बजे आ गया था कि अगर भीड़ ज़्यादा भी हो, तो टिकट आराम से मिल जाए। मलिक भाई को बोल दिया था कि आज नाटक देखने जाना है, जल्दी जा रहा हूँ ।

यहां पहुंचकर बिलकुल ऐसा लगता है, जैसे सपनों कि दुनिया में आ गया हो। हर तरफ नाटक के पोस्टर और वही लोग, वही माहौल। उधर एन.एस.डी. चले जाओ या इधर श्रीराम सेंटर में आ जाओ। हर तरफ वही लोग दिखायी देते हैं, जिनसे उसे प्रेरणा मिलती है। हर वक्त नाटकों में डूबे हुये, रंगमंच की बातें करते हुए। यही माहौल वह चाहता था, जो अपने छोटे-से शहर में उसे नहीं मिल पाता था। यही माहौल, जिसक लियेवह अपने घर से इतनी दूर दिल्ली आया था। 

हां, वहां भी कभी-कभी नाटक होते थे, जब कोई संस्था कई जगहों की नाटक कंपनियों को आमंत्रित कर, नाटक मंचित कर अपने संस्थापक को या कोई उद्योगपति अपने पिता को श्रद्धांजलि देना चाहता था। उनमें टिकट नहीं लगते थे। वह हर रात देर तक बैठकर सारे मंचन देखा करता था। 

टिकट न लगने के बावजूद हॉल लगभग खाली ही रहता था। रात को जब घरों में खाना-वाना बनने का समय होता, तो हॉल में लोगों की संख्या थोड़ी बढ़ जाती, जिनमें बच्चे ज़्यादा होते। कारण उसे यही समझ में आता था कि खाना बनाने में जब बच्चे मां को परेशान करते होंगे, तो मां कहती होगी- ’’जा बेटा चुन्नू, नागरी नाटक मंडली में एक नाटक देखकर आ, तब तक मैं खाना बना लूँगी। यहां रहेगा, तो मुन्नी से झगड़ा करता रहेगा।’’

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पत्नियां अपने पतियों को पुचकारती होंगी- ’’अरे, आप मुझे आराम से खाना बनाने दीजिए न! तब तक जाइए, शर्मा जी को लेकर थोड़ी देर नाटक देख आइए। खाना बनाकर मैं गोलू को भेजकर आपको बुलवा लूंगी।’’        

नाटक चलने के दौरान गेट खुला रहता। जिसका जब मन करता, जाता, जब मन करता चला आता। पहली और दूसरी पंक्ति के दर्शकों को छोड़कर, जिनमें ज़्यादातर नाटकों और निर्णायक मंडल से जुड़े लोग होते, कोई लगातार पांच मिनट मुंह बंद करके न बैठता। 

बीच-बीच में लोग सीटियां भी मार देते, ख़ासतौर पर जब मंच पर कोई सुंदर लड़की आती और तालियां न बजाने वाली जगह पर भी अपने शहर की प्रसिद्ध मस्ती का उदाहरण देते हुए इतनी एकता से इतनी देर तक तालियां बजाते कि अगली दो-तीन लाइनें सुनायी ही न देतीं। 

दर्शकों में किशोर लड़कियों के होने की भी संम्भावना होती है। इस संभावना को नजरअंदाज न करते हुये कुछ स्थानीय स्कूलों के किशोर भी संभावनाएं तलाश करने थियेटर में आ जाते। नयी सुंदर शर्टें और टमाटर कट जाने लायक क्रीज लगी पैंटें पहनकर। 

कुछ गिनती के ही दर्शक होते, जो नाटक को नाटक की तरह देखते। बाकी सिर्फ वहां टाइम पास करने आते और उजड्डई करते रहते। उसे बहुत गुस्सा आता। ये नाट्य संस्थाएं, जो इतनी दूर से आयी हैं, क्या सोचेंगी हमारे शहर के बारे में ? क्या यह वही शहर है जिसने देश के बड़े-बड़े नाटककरों भारतेंदु और प्रसाद को जन्म दिया है जिनके नाटकों के मंचन आज भी देश के हर कोने में होते हैं। 

कुछ देर में लोगों की भीड़ इकट्ठी होने लगी थी। हर तरफ़ पढ़े-लिखे और सभ्रांत लोगों के झुंड दिखाई देने लगे थे। सुंदर-सुंदर कारों में बैठकर आये आदमी-औरतें और ख़ूबसूरत युवा जिनके सामने संभावनाओं के असीम सागर लहरा रहे थे, सिर्फ़ नाटक देखने के लिये अपना समय निकाल कर आये थे। सबकी ओर देखकर यही लग रहा था कि सभी सिर्फ़ नाटकों और नसीर जी के विषय में बातें कर रहे हैं।

एक सपने के सच होने जैसा है सब कुछ उसके लिये। रंगमंच का बेताज बादशाह, उसका प्रिय अभिनेता आज उसके सामने अभिनय करेगा। यहां वास्तविक कद्र है नाटकों और अभिनेताओं की। वरना वहां उसके शहर में एक बार दोस्तों ने सिर्फ़ इस बात पर उसका मज़ाक उड़ाया था कि वह अंधे लड़कों द्वारा प्रस्तुत नाटक देखने चला गया था।

“तो क्या तुम लोग सिर्फ़ लड़कियां देखने जाते हो ? नाटक अच्छा हो बुरा, अभिनय किस स्तर का है, प्रकाश, मंच, संगीत कैसा है, इससे तुम्हें कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता ?” पूरी बहस के बाद उसे वाकई चौंकाने वाली यह बात पता चली थी।

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बदले में सब सिर्फ़ हंसे थे। उसे अपनी संगति पर तरस आया था। स्नातक की परीक्षा ख़त्म होते ही उसने दिल्ली की ओर कूच कर लिया। वहां वैसे भी उसके लिये कुछ ख़ास नहीं बचा था। पिता से उसका अल्प संवाद, जो शुरू से ही औपचारिक रहा था, अब नाटकों में उसके बढ़ते शौक से ख़त्म- सा हो गया था। मां बड़े भाइयों की तनख्वाह, उनकी शादी जैसे गंभीर मसलों से जूझने लगी थी। उसे किसी ने रोकने की कोशिश नहीं की। 

यहां उम्मीदों के जहाज़ पर बैठ कर आया वह उस समय बिल्कुल निराश हो गया जब उसने छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब सबको भागते देखा। एक अंधी दौड़ में, जहां उन्हें ख़ुद ही नहीं पता कि किस कीमत पर क्या पाने के लिये दौड़ रहे हैं। 

उसने एक गोल परिधि में भागते हुये लोगों को देखा, जो भाग कर हर शाम उसी बिंदु पर आ जाते हैं, जहां से सुबह भागना शुरू किया था। ज़िंदगी का एक दिन निकल जाने का उन्हें अहसास भी नहीं होता और वे अगली बार भागना शुरू कर चुके होते हैं। वह समझ गया कि यहां जगह बनाना उतना आसान नहीं हैं, जितना उसने समझ रखा था।

नाटकों का आनंद उठाने के लिये जिंदा रहना ज़रूरी था, जिंदा रहने के लिये कुछ खाना ओर कुछ खाने के लिये कुछ कमाना। उसने एक कूरियर कंपनी में काम करना शुरू कर दिया। हालांकि बिना बाइक के काम मिलने में दिक्कत हुयी और करने में भी दिक्कत होती थी, पर अंदर एक जूनून उसे हर वक़्त सक्रिय रखता था। 

चाहता, तो दिल्ली में कई रिश्तेदारों ओर दोस्तों से उधार या कुछ मदद ले सकता था पर अपनी अंदरूनी आग और जूनून ने उसे अकेला ही अपने सपनों के घरौंदो की दीवार पर अपने पसीने का प्लास्टर करने में लगाये रखा।

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