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अधखड़ी हवेली बाबू जगत नारायण को हिलते दाँत की तरह दुख देने लगी... न टूटे, न कुछ ठंडा-गरम ही खाने दे। 

हवेली


ओसारे से बाहर सिर निकालते ही माघ का तुषार बबूल के काँटे की तरह बरसा। कमलाकांत उपाध्याय के जोड़-जोड़ में सिहरन भर गई। उनके दाँत ज़ोरों से रपटने लगे। वह भीतर लौट आए और आलने पर के पुराने कपड़े उलटने-पुलटने लगे। पत्नी पास ही खड़ी थी। सूनी-सूखी आँख उठाकर उनकी तलाश को भाँपते हुए। कमलाकांत ने पुराने कपड़ों का गट्ठर छान मारा, लेकिन चादर न मिली।

‘का खोज रहे हैं?’ उनकी उठा-पटक से पत्नी परेशान होकर बोली। 

‘चदरिया नहीं मिल रही है?’ उनके उत्तर में प्रश्न भी शामिल था। परेशान होकर वह बिखरे कपड़ों को फिर उसी जगह रखने लगे, पहले सोचा कि ऐसे ही निकल जाऊँ, लेकिन बाहर पाला झनझना रहा है। 

‘मिलेगी कहाँ से!’ पत्नी बुदबुदाई, ‘बबुआ को अपने त ओढ़ा आए हैं।’

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हारकर वह बेटे के पास चले गए। उसके लिलार पर हाथ रखा। वह प्रतिक्रियाहीन पड़ा रहा। निश्चेष्ट। लगभग एक घंटा पहले वह बेटे के पास ही बैठे थे। जब सरसाम की-सी हालत में उसका बड़बड़ाना तेज़ हो गया था। तेज़ बुखार में कँपकँपाहट के साथ जूड़ी ऐसे चढ़ी आ रही थी, जैसे बाढ़ का पानी। एकमात्र कंबल को खींच-खाँचकर उन्होंने उसकी थर्राहट कम करने का प्रयत्न किया था, लेकिन रेशा-रेशा घिस चुके बूढ़े कंबल को जैसे खु़द किसी ओढ़ने की ज़रूरत थी।

कमलाकांत ने वही किया था... अपनी चादर उतारकर कंबल पर साट दी थी। इसके बाद भी उसका काँपना बंद न हुआ था। बाप का ममत्व... उनमें एक इच्छा जगी कि वह अँगीठी में बदल जाते तो सुलग-सुलगकर बेटे को गर्मी पहुँचा देते... लेकिन अँगीठी तो दिल में जलती है, जलती क्या, धुंधुआती है और शायद ही उससे खु़द को भी राहत पहुँचती हो। उन्होंने तख़त पर बिछी कथरी को भी बेटे पर फैला दिया था... और बेटा अभी बेहोश-सा पड़ा था। उन्होंने किसी जेबकतरे की तरह बड़ी सावधानी से उसकी देह से चादर खींचना शुरू किया। पत्नी उनके काम को ऐसे देखती रही, जैसे कोई खलखींचवा मुर्दार पशु की देह की आख़िर खाल उतार रहा हो, पत्नी से आँखें टकराईं तो अपनी ही नज़र में ओछे बन गए जैसे। 

पल-भर के लिए उनका हाथ सुन्न-सा हो गया और खुश्क आँखें सफाई-सी देती मालूम पड़ीं; क्या करूँ? बाहर जाना नितांत आवश्यक न होता; तो भला कौन बाप यूँ बज्जरकरेजी बने? हालाँकि पत्नी कुछ बोल नहीं रही थी... बुत बनी उनको निहारने के सिवाय... उसकी आँखों में वही सूनापन था, जो हर वक़्त रहता है। न कोई उलाहना, न कोई उमंग... एक तटस्थ-सा समझौते का भाव।

सामना न कर सके वह। कमलाकांत से ठहरा न गया, चादर उठाई और उसमें अपने को छुपाते हुए लंबे-लंबे डग भरने लगे। ज़िद्दी ठंड थी कि मच्छरों की तरह उनकी देह के नंगे हिस्सों पर डंक चुभो ही देती थी। लत्ते-सी हो चली इस चादर को बदलने का ख़याल उन्हें फिर हुआ, लेकिन क्या-क्या बदलें वह? हालत तो ऐसी है कि आगे ढको तो पीछे उघाड़। वह हथेलियाँ घिसते हुए तेज़-तेज़ चलने लगे, ताकि इसी से गर्माहट बनी रहे।

पिछले दिनों वायुमंडल में अचानक निम्न चाप हो जाने से बूँदाबाँदी हो गई थी। आज मेघ के पूरी तरह खुल जाने से धरती का रहा-सहा लिहाफ़ भी जाता रहा, सो ठंड उग्र हो चली थी। कुहरे की धुंध में वह शीत से थर-थर बढ़े जा रहे थे। गाभिन गाय की तरह माघ की अलसाई रात में समय का अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल था। तिथि के मुताबिक अँधेरिया कब की बीत जानी चाहिए थी, लेकिन धुआँसी चाँदनी घने कुहरे के सामने धरती को रोशन करने में कितनी बेबस थी।

पल-भर के लिए वह बड़े हो गए और अपने गाँव की ओर रुख किया। चारों तरफ सोता पड़ गया था। कुत्ते भी नहीं भौंक रहे थे। उनका गाँव गोलाकार बसा हुआ है। धुंध में डूबा गाँव किसी दैत्याकार पशु के गोबर के चोथ की तरह लग रहा था। गाँव के अमूमन बीच में खड़ी बाबू जगतनारायण सिंह की दोमंज़िली हवेली बड़ी ही वीभत्स लग रही थी। उसका अगवासा ढह चुका था। जैसे किसी जंगली मकना हाथी का निचला जबड़ा तोड़ दिया गया हो और दर्द के मारे वह मुँह फैलाता जाए, ऐंठते हुए।

मकान बनवाने के लिए अपशकुन से बचने के लिए लंबे बाँस से जो सूप, जूता और झाड़ू लटकाए गए थे, उस पर शायद एक उल्लू आकर बैठ गया था। बड़े ही भयावह तरीके से उसने तीन आवाजे़ं निकालीं, ‘आऊक ...आऊक... ओ ऊ ऊ ऊ क’ कमलाकांत ने कानों पर हाथ रख लिया। कर्कशता से बचने के लिए, लेकिन अपशकुन से कहाँ बच पाया कोई? कितने अरमानों से बाबू जगतनारायण ने हवेली को नया रूप देना चाहा था। इसके लिए उन्होंने कितने सही वक़्त का चुनाव किया था। माघ का महीना मालिकों के लिए बड़ा अच्छा होता है। इस समय मज़दूर सस्ते मिलते हैं। हर साल का नियम है; इस दोफसली देहात को भादो और माघ महीने में दुर्दिन आ घेरता है। भादो तो खै़र बरसात और बाढ़-बूड़े के चलते, लेकिन माघ में फसल तो खेतों में लहलहा रही होती है और खेतिहर मज़दूरों को बैठकी का सामना करना पड़ता है। 

खेतों में काम तो रहता नहीं और रोज़ी-रोज़गार का दूसरा कुछ साधन मिलता नहीं। हाथ पर हाथ रखे भूखों मरने की नौबत आ जाती है। कुछ तो पंजाब-हरियाणे की तरफ भाग चलते हैं और जो बाक़ी बचे वे मालिकों से डेढ़ा-सवाई पर अनाज उधार लेते हैं। माघ में एक मन लिया तो चैत में कटनी-दवनी के वक़्त मज़दूरी में से डेढ़ मन कटवा देंगे। भूख से बेहाल हुए मज़दूर उनसे अनाज उधार माँगने गए थे। उन्होंने देना भी चाहा था। ताकि मज़दूर दूसरे प्रांतों में न भाग जाएँ। लेकिन कुछ चीजे़ं बंधक रखकर। 

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मज़दूरों के पास अपनी देह के अलावा बंधक रखने को था क्या! उन लोगों ने काम ही देने को कहा। जगतनारायण सिंह कई वर्षों से मन बनाते आ रहे थे, हवेली के पुराने ढंग के अगवासे को तोड़कर नई डिज़ाइन देने का। नए ढंग के बैठका में एयरकूलर भी लगाने का विचार था। पिछला हिस्सा यानी रिहायसी कमरे या जनानाकित्ता उसी पुराने ढंग का रहता। 

चोरी-डकैती से वे कमरे सुरक्षित थे, क्योंकि उनमें जंगले नहीं थे। मज़दूरों ने दो-तीन दिन काम करके उन हिस्सों को ढाह दिया। अब वे उनसे सरकार की तयशुदा मज़दूरी की माँग करने लगे। बाबू जगतनारायण को लगा कि यदि एक बार उन लोगों को चोखी मज़दूरी का स्वाद लग गया तो खेती के काम में भी वही दर माँगने लगेंगे। तत्काल उन्होंने काम बंद करवाया और दूसरे गाँव से मज़दूर बुलवा लाए! 

आनगँवई और निजगँवई मज़दूरों में हल्की-सी झड़प भी हो गई। लेकिन समझाने-बुझाने से सरकारी रेट पर मिलने वाली मज़दूरी की बात पर आनगँवई मज़दूर भी इनके साथ हो गए। अधखड़ी हवेली बाबू जगत नारायण को हिलते दाँत की तरह दुख देने लगी... न टूटे, न कुछ ठंडा-गरम ही खाने दे। दोनों तरफ से आन चढ़ गई और वह आन कैसी जो चुनौती की सान पर पजकर दुधारी से भी तेज़ न हो उठे? 

...उल्लू फिर बोला, ओ...क् ओ...क् ...आऊक् और डैना पटपटाते हुए उड़ चला। कमलाकांत को चेत हुआ उल्लू के बोलने पर, वरना न जाने कितनी देर तक हवेली के बारे में ही सोचते रह जाते।


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