एपिसोड 1

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अनुक्रम

एपिसोड 1-3 : शुगर डैडी
एपिसोड 4-6 : सुख के बीज
एपिसोड 7-9 : आईलाइनर
एपिसोड 10-12 : पटना से चिट्ठी आई

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बादलों के टकराने से जो बिजली कौंधी उस रोज़ वो दिल में हूक कर गई। दसवें दिन बिजली फिर चमकी, इस बार रात आठ बजे।

कहानी : शुगर डैडी

बिजली

गाड़ी से एक पैर बाहर रखते ही हथेलियाँ पसीने से तर हो गईं। नवम्बर का महीना, ना गर्मी ना उमस, मिसेज़ मेनका शर्मा ने पर्स से पहले रूमाल निकाला, फिर फे़स पाउडर का डिब्बा, सबसे आख़िर में वह पर्ची जिस पर अधकचरी अंग्रेज़ी में पता लिखकर लल्लन उनके हाथों में पकड़ा गया था। उस वक़्त तो उन्होंने काग़ज़ का वह टुकड़ा बड़ी उदासीनता से मुचड़कर मुट्ठी में भर लिया जैसे लल्लन की बातों पर पूरा अविश्वास हो। वह मुँहलगा ढीठ ड्राइवर लेकिन बीवी-बच्चों की क़समें खाने को तैयार था, “मधुरवा का सप्पथ खाते हैं सरकार, चार बेर वह हमरे गाड़ी में आई है, बेटिया भी हमेशा साथ में रहती है। पिछला महीना साहब बंबई भी माँ-बेटी के साथे गए थे। उसका तो कॉलेज में नाम भी लिखवाए हैं साहब।”

बाएँ हाथ की तर्जनी उठी और लल्लन समझ गया उसे बरजा जा रहा है। पुराना घाघ नौकर था लल्लनवा, अंदर ही अंदर हँसा। उप्पर वाला का बहीखाता में कोनो गड़बड़ नहीं। 

एक समय इनको और साहब को साथ गाड़ी में घुमाया है। तब चिड्ड़ैया टाल के पीछे क्वाटरों के बाहर सिर झुकाकर खड़ी रहती थी। रोज़ सुबह साहब के साथ वहाँ से गाड़ी में बिठाकर बेली रोड पर खादी भंडार में उतारता और फिर साहब को उनके ऑफिस। शाम आठ बजे उसका काम उनको खादी भंडार से उठाकर साहब के नए ऑफिस पहुँचाने का था, जिसके बाद गाड़ी और चाभी साहब के हवाले कर उसे घर जाने की अनुमति मिल जाती। उन दिनों यह शिफॉन की रंग-बिरंगी साड़ियों, मोतियों के मँहगे सेट और करीने से ब्लो ड्राई किए बालों को पीठ पर लहराती मिसेज़ शर्मा थी भी कहाँ। 

सूती साड़ी, सामने लटकती मोटी चोटी, छोटी काली बिंदी और दायीं कलाई में काली बेल्ट वाली घड़ी। बस आँखें जाने कैसे आत्मविश्वास से चमकती रहतीं। मीरा पांडे गाड़ी में सिर झुकाए ऐसे बैठती जैसे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रही नौवीं-दसवीं की लड़की हो। साहब की बड़की लड़की भी तो उस समय सातवीं-आठवीं में ही पढ़ती थी।  

पते को एक बार और पढ़कर उन्होंने पर्स में रखा और जैसे अचानक कोई काम याद गया हो, कड़कती आवाज़ में ड्राइवर को मौर्या लोक ले चलने का आदेश दिया। संगम साड़ी का मैनेजर उनको देखते ही हाथ जोड़े उठ खड़ा हुआ, “अरे हम कल्ले याद किए थे आपको, बनारस से तीन पेटी पहुँचा है, प्राइस भी नहीं लगाए हैं अभी। अरे मिसरा जी बनारस वाला बक्सा खोलिए पहिले, अरे सिल्क नहीं पहनती मैडम, शिफॉन दिखाइए इनको।” 

मिश्रा जी नए थे शायद, अचानक अवतरित हुई हाई प्रोफाइल कस्टमर को देखकर अकचका गए, काठ के बक्से की सील मार दो हत्थड़ खोलने लगे।

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एक-दो बार में कौन पहचान पाता है कस्टमर को, मिसेज़ मेनका शर्मा ने मुस्कुराने की कोशिश की, कई बार याद दिलाना पड़ता है कि नहीं। 

“ज़री किनारी वाली साड़ी दिखाइएगा, सिल्क में, ना-ना सूती कहाँ खरीदते हैं हम।”

दोपहर बाद के उनींदे खादी भंडार को अपनी ठहरी गंभीर आवाज़ से गुँजाकर घनी मूँछों वाला पुरुष जैसे आँखों ही आँखों में उसका उपहास उड़ा रहा था। पसीजने लगी थी उस आवाज़ से मीरा पांडे। अपनी सूती साड़ी में सिकुड़ी, चोटी को पीछे कर साड़ियों का गठ्ठर बाहर निकाल टेबल पर रखा। 

“लाल छोड़ दूसरा रंग दिखाइए ना, लाल-गुलाबी तो हम पिछला हफ्ता ही ले नहीं गए थे, आपही तो थी यहाँ कि नहीं।” 

“आप कलर बता दीजिए, हम निकाल देंगे”, उसने गठ्ठर वापस रखकर सरकारी बेरूखी दिखाने की कोशिश की। 

“अब हम जेन्ट्स लोगों को पता होता रंग का तो बार-बार दुकान थोड़े ना दौड़ते”, कस्टमर इस बार ठहाकों में हँसा तो जैसे कई बादल ज़ोर से टकराए। 

“एक बार अपने कंधे पर डालकर दिखा दीजिए ना, अंदाज़ा हो जाएगा हमको भी कि क्या जँचेगा।” 

झिझक छोड़ मुस्कुराई मीरा पांडे और ज़री बॉर्डर वाली तीन नीली-मोरपंखी साड़ियाँ बिलिंग काउन्टर पर रख आई। 

ऐसे पति भी होते हैं दुनिया में, पसंद आए तो तीन-तीन साड़ी एक साथ। कौन जाने बड़ा परिवार होगा साहब का, चोटी वापस आगे लटका कुर्सी में धँस गईं। लेकिन बादलों के टकराने से जो बिजली कौंधी उस रोज़ वो दिल में हूक कर गई। 

दसवें दिन बिजली फिर चमकी, इस बार रात आठ बजे। मैनेजर साहब छुट्टी पर थे, कैशियर बाबू को हिसाब मिलाते-मिलाते देर हो गई थी। गाँधी आश्रम से आई एक मैडम काली बॉर्डर की दो साड़ियों के चक्कर में हैंडलूम का पूरा रैक काउंटर पर फैला गई थीं। उसे समेटने में फूली साँस को संयत करती मीरा पांडे ने पानी की बोतल मुँह से लगाई ही थी कि बेवजह हँसने की आवाज़ ने हाथ हवा में रोक लिए। 

“का तिवारी जी, लगता है खूब बिक्री हुआ है आज। चलिए हम थोड़ा काम और बढ़ाते हैं। मैडम भी यहीं हैं आज तो, ज़री बार्डर में पीला-नारंगी में कुछ हो तो दिखाइए ना। उस दिन वाला साड़ी सब तो हिट हो गया।” 

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“अब तो रजिस्टर बंद करने का टाइम है, आप कल आइएगा सर।”

“का मैडम, कस्टमर को कोई वापस भेजता है क्या, आप लोग ऐसे ही सरकारी दुकान का लुटिया डुबा रहे हैं। दो साड़ी के लिए क्या मंत्री जी को फ़ोन मिलाना होगा। अभिए मिलकर आए हैं, उन्हीं के साथ मीटिंग में तो देरी हुआ है।”

कैशियर साहब ने रजिस्टर बंद करने से पहले खाते में पाँच और साड़ियाँ दर्ज की और शटर गिराकर साइकिल पर निकल गए। 

“किधर तक जाना है, चलिए ना हम छोड़कर आते हैं, अब मेरे कारण देरी हुआ है तो कुछ तो सेवा का मौक़ा दीजिए”, बोलने वाले की आँखें और आवाज़ दोनों अवरोह पर थे। आधे घंटे पहले के रुआब से बिल्कुल अलग। टैंपू का इंतज़ार करती मीरा पांडे के टखने जवाब दे रहे थे। बाएँ पैर की चप्पल में दो दिन पहले ठुकवाईं कील बार-बार चुभ रही थी। घर पहुँचने पर माँ और चाचा के सवाल अलग झेलने थे। इस बार चाचा उसका जवाब सुने बिना टलने वाले नहीं थे। पिछले चार दिन में दोनों उसके सामने सारे हथियार आज़मा चुके थे। कुएँ से निकलकर खाई में पटके जाने की कल्पना से ही उसका सारा शरीर पसीने से तर हो गया।   

फिएट सिएलो की खुली खिड़की से आती एसी की ठंडी हवा को मना नहीं कर पाई मीरा पांडे। 

उत्साही मिश्रा जी बक्से से बनारसी शिफॉन और ऑरगेंज़ा का ढेर खड़ा कर चुके थे। काउन्टर के दूसरी ओर मिसेज़ मेनका शर्मा ने सनग्लास सिर पर चढ़ा मुट्ठी भर की साड़ियों को हथेली में तौलना शुरू किया। सुनहरी ज़री और बूटों के बारीक काम पर हाथ फिराते-फिराते दिमाग आगे की योजना बना चुका था। गुड़ देखते ही मक्खी की तरह भिनकने वाली ऐसी औरतों को मसलने का तरीक़ा उन्हें खूब पता था। 

पचास हज़ार के बिल पर क्रेडिट कार्ड का पासवर्ड डालने के बाद सनग्लास जब वापस आँखों पर आया तब तक  हथेलियों का पसीना सूख चुका था। चेहरे पर वही आत्मविश्वास वापस आ गया। वैसे भी देर करने का मतलब नहीं था, शर्मा जी को कल ही वापस आना था दुबई से। पति को तलब करने से पहले इस गुब्बारे में सुई चुभाना ज़रूरी था।

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