एपिसोड 1

लड़की और लड़का, पीठों पर रकसैक टाँके हुए और लड़के की पीठ पर तो एक गिटार का भी अतिरिक्त बोझा, पुटुस की झाड़ियों के बीच से पिछले दरवाजे की तलाश करने लगे। एक जगह की घनी झाड़ियों के बीच से झक्क से बिसराम प्रकट हुआ। दोनों चौंक गए...

भूत-प्रेत

बहुत दूर से देखें मतलब कैमरे की जबान में जिसे लाँग शाॅट कहते हैं तो ऊँचे-ऊँचे शालवृक्षों के बीच एक हरे रंग के ही धब्बे-सा दिखनेवाला मकान, नहीं मकान नहीं क्योंकि कैमरा ज्यों-ज्यों पास आता जायेगा यह धब्बा बड़ा होता हुआ मकान की परिभाषा से बाहर चला जायेगा। ऊँची दीवारों पर काई की परत इसे हरे रंग का बना रही थी। जंगल की निझूम शांति कभी किसी पंडुकी के डहुकने से थरथरा जाती तो इतना बड़ा मकान जिसे मैंशन कहना ज्यादा उचित होगा हल्का-सा काँप कर रह जाता। गोथिको रोमन शैली के खंभे दूर से ही दिखाई पड़ते लेकिन पास आते ही जैसे काई लगी दीवारों के पीछे सबकुछ रहस्य के हरेपन-गहरेपन में छिप जाता। जगह-जगह से झरे हुए प्लास्टर के खालीपन पर भी हरेपन का कब्जा हो गया था। शाल के पटरों से बना और तारकोल से पुता विशालकाय दरवाजा थोड़ा सा अस्वाभाविक लगता क्योंकि आप किसी नक्काशीदार लोहे के फाटक की अपेक्षा कर रहे होते जो चूँ-चर्र की आवाज के साथ खुलता मगर लोहे की मोटी कड़ियों को खासे देर तक खड़काने पर एक छोटी सी खिड़की खट से खुल जाती और उससे जो चेहरा झांकता वह विसराम भुईयाँ का होता-आबनूसी रंग, झुरियों की गहरी लकीरें, बाल-दाढ़ी और दाँत झक सफेद - कोन चाही?

- आप बिसराम?-लड़की ने पूछा

- हाँ? का चाही?

- हमें महादेव ने भेजा है। कमरों के बारे में कहा था न उसने?

- आप ही लोग उ फिलिमवाला है?

- हाँ! हाँ! - लड़की और लड़के के चेहरे पर आश्वस्ति अब आयी थी।

- पीछे का दरवाजा से आईये। खट से खिड़की बंद हो गई।

- ओफ्फोह! अब यह पीछे का दरवाजा किधर है?-लड़की और लड़का, पीठों पर रकसैक टाँके हुए और लड़के की पीठ पर तो एक गिटार का भी अतिरिक्त बोझा, पुटुस की झाड़ियों के बीच से पिछले दरवाजे की तलाश करने लगे। एक जगह की घनी झाड़ियों के बीच से झक्क से बिसराम प्रकट हुआ। दोनों चौंक गए।

- इधर ही है दरवाजा आइये - बिसराम फुसफुसाया।

- इतना डरने का क्या है? हमने तो सुना है पहले भी आप फिल्मवालों को कमरा देते रहे हैं - लड़की ने पूछा।

- पहले मालिक नहीं रहते थे। अब रहते हैं।

- तो उनको कोई आब्जेक्शन तो नहीं होगा - इस बार लड़के ने पूछा था।

- का नहीं होगा?

- मतलब उनको कोई परेशानी...........

- ऐसे तो उनका दिमाग थोड़ा ... मतलब लेकिन आपलोग हल्ला-गुल्ला एकदम नहीं करेंगे तभी हम रूम देंगे। आर बाजा-उजा एकदम नहीं-गिटार की तरफ घूरकर देखते हुए बोला बिसराम।

- ठीक है-ठीक है! यहाँ से बस्ती कितना दूर है?

- थोड़ा चलना पड़ता है। उधार जो टुंगरी है न बस वहीं पर।

- हमलोगों के खाने-पीने का?

- सब हम बनायेंगे न। मालिक के लिए बनाते है उसी में। कितना दिन बनायेंगे फिलिम?

- देखते हैं। आपका पैसा टाइम से मिल जायेगा।

इसपर बिसराम सफेद दाँतों को चमकाकर हँस दिया।

- तेरा नाम क्या है मँईया?

- शांभवी।

- आर तोर बाबू?

- जोनाथन लकड़ा।

- अरे! तब तो इधरे के हैं, बहुत अच्छा, चलिए।

अब जाकर दोनों ने देखा कि काई से पटी दीवारों के बीच पुटुस की घनी झाड़ियों के बीच से एक खुल-जा-सिमसिम टाइप दरवाजा था- छोटा और संकरा। एक आदमी जाने लायक - रकसैक भी बड़ी मुश्किल से पार हुए उस दरवाजे से। दरवाजे से अंदर घुसते ही मकान की विशालता ने घेर लिया उनको एक दूसरे लोक में प्रवेश करने की तरह। रहस्यमयता और गहरी हो गई - विशाल खंभे, लंबी सी बारादरी, दरवाजे और खिडकियाँ एक ही साईज के, बड़े से आँगन के चारो तरफ कमरों की कतारें, अधिकतर दरवाजों पर झूलते ताले - जैसे ताले को खोलते ही किसी रहस्यलोक का दरवाजा खुल जायेगा। एक दरवाजे पर ताला नहीं लगा था। कुछ आवाज भी आ रही थी जैसे गुन-गुन करके कोई मंत्रोच्चार कर रहा हो। जोनाथन ने उत्सुकतावश हल्का-सा धक्का दिया दरवाजे को।

- कौन?-भारी आवाज के साथ गुगुल-धूप-धुँए का बवंडर दरवाजे के बाहर निकला।

- कोई नहीं, हम है विसराम।

- ओ!-भारी आवाज फिर गुनगुन में खो गई थी।

- मालिक? - शांभवी की निगाहें बिसराम की तरफ उठी।

- अरे नहीं! आप ही लोग के तरह के साधु हैं। तंत्र-मंत्र कुछ करते हैं। बोले यहीं शांति है तो हम बोले रह जाइये।

- शाहदेव मैंशन को पूरा किराया पर लगा दिये हैं न? - जोनाथन ने हँसते हुए कहा था।

- का करें बाबू। जंगल में का किराया लगेगा? बस मन लग जाता है और का -

- और लोग है तो अभी बता दो बिसराम बाबू - शांभवी ने छेड़ा था।

- नाय मईयाँ! अब आदमी तो बस इतने है, बाकी भूत-प्रेत है, बस।

- भूत-प्रेत!- शांभवी चिहुँक पड़ी।

- अब इतना पुरना महल है, उ भी जमींदार लोग का केतना कुछ हुआ होगा - तो भूत-प्रेत तो यहीं न भटकेगा, कहाँ जायेगा। बिसराम की आवाज में तल्खी आ गई थी जिसे जोनाथन ने भी महसूस किया और शांभवी ने भी। विसराम ने स्वादिष्ट खाना बनाया था या उन्हें ज्यादा भूख लगी हुई थी। स्वाद शायद भूख से ज्यादा होता है - रूगड़ा(मशरूम) की सब्जी और भात। भरपेट खाते ही भात के नशे ने शांभवी को अपनी गिरफ्त में ले लिया। वह बेसुध होकर सो गई थी। पक्की सड़क से पैदल चलते हुए दो किलोमीटर तो होगा ही शाहदेव मैंशन। पीठ पर भारी रकसैक भी तो था। जब नींद खुली तो अंधेरा घिर आया था। इस बीच शायद एक बार बारिश भी हो चुकी थी। बादलों ने अंधेरा कर रखा था। जोनाथन कहीं दिख नहीं रहा था। पूरा शाहदेव मैंशन जेसे एक गाढ़े-लिसलिसे सन्नाटे में लिथड़ा पड़ा था। अचानक आवाज से चौंकी थी शांभवी 

- चाय! - बिसराम अंधेरे में से प्रकट हुआ था झक्क सफेद दाढ़ी और बालों के साथ।

- जोनाथन?

- बड़ी देर से निकला है जंगल के तरफ। मना किए थे, माना नहीं मईयाँ। कहीं रस्ता न भुला गया हो।

- जंगल का लड़का है रास्ता कैसे भूलेगा?

- इधर का जंगल अलग है। आदमी रस्ता भुला जाता है। - शांभवी चिंतित हो गई थोड़ा।

- चलो बिसराम, आगे देखते हैं।

- मालिक खोजेंगे। हम कैसे जायें मईयाँ।

- मैं ही देखती हूँ।

बिसराम ने एक बड़ा टार्च दिया। शांभवी निश्चित थी कि जोनाथन आस-पास ही होगा। कैमरा स्टैंड पर नहीं था। इसकी आदत में शुमार था आसपास के स्टाॅक शाॅट लेना, लेकिन अब तो अंधेरा घिर आया था। बिसराम कह रहा था - वहीं पर मिलेगा, हम बता रहे हैं न।

- कहाँ?

- काली चट्टान के पास।

- काली चट्टान? किधर है?

- हम दूर से दिखा देंगे, हम जायेंगे  नहीं मईयाँ।

- क्यों?

- बस वैसे ही, वो देखिए .....

बड़ी सर्चलाइट जैसी टार्च की रोशनी घुमाते ही जोनाथन की टी-शर्ट चमकी थी। वह खड़ा था इस तरह जैसे जम गया हो। शांभवी ने सर्चलाइट घुमायी चारो तरफ। सचमुच बड़ी अजीब सी जगह थी। एक बड़ी-सी काली मतलब अंधेरे में तो काली ही दिख रही थी चट्टान पसरी थी जैसे बहुत बड़ा-सा कोई जानवर पड़ा हो और चारों तरफ घेरे खड़े शाल वृ़क्ष जैसे मृत्यु का शोक मना रहे हो।

- जोनाथन! - झिझोड़ा था शांभवी ने।

- ऐं। ऐं - जोनाथन जैसे सम्मोहन से जागा था।

- क्या कर रहे हो यहाँ?

- स्टाॅक शाॅट के लिए आया था और थोड़ी देर गिटार बजाने के लिए। वहाँ तो मना है न?

- लेकिन कैमरा तो पड़ा है उधर और गिटार भी?

- पता नहीं जब आया था तो चट्टान पर धूप बिछल रहीं थी। शाल के पेड़ों के बीच से जो रोशनी के डिजाइन बन रहे थे उसे देखता रहा काफी देर तक। तुम्हें यकीन नहीं होगा अद्भुत था वह नजारा फिर कुछ याद नहीं क्या हुआ।

- चलो चलते हैं - शांभवी ने कैमरा उठा लिया था और जोनाथन ने गिटार।

शाहदेव मैंशन पहुँचकर बिसराम से पूछा तो वह सिर्फ मुस्कराया एक रहस्यमयी मुस्कान -मत जाना उधर, परेशान हो जाते हैं उ।

- उ, मतलब कौन?

- कभी बतायेंगे कहानी, रात में किसी तरह का आवाज आये तो न तो पूछ-ताछ करना व आवाज देना मईयाँ।

- कैसी आवाज?.... शांभवी सचमुच डर गयी थी। बिसराम ने जैसे उन्हें डराने का ठेका ले लिया था।

- अरे, लालबाबा पूजा पाठ करते हैं रात में। वहीं सब आवाज और क्या?

- मालिक मना नहीं करते? - इस बार जोनाथन ने पूछा था।

- मालिक कहाँ भीतरखंड के तरफ आते हैं? उनके तक तो आवाज भी नहीं पहुँचता है। ऐसे भी थोड़ा गड़बड़ा गये हैं। उ तो अपने का का इंगलिश बकते है रात को - कहता हुआ बिसराम चला गया।

- गजब जगह लाये हो जोनाथन! और कोई जगह नहीं मिली?

- खाना मईयाँ? - बिसराम प्रकट हुआ था।

- भूख तो नहीं है, दिन में देर से खाये थे न। जोनाथन?

- फ्रूट केक का पैकेट पड़ा है। वहीं खा लेंगे। वैसे भी तो लगता है रात में जागना होगा।

- क्यों? - शांभवी ने पूछा।

जोनाथन ने डरावने स्वर, नाटकीय अंदाज में कहा - शाहदेव मैंशन पूरी तरह जाग जाता है रात को। चारों तरफ से किसिम-किसिम की आवाज़ें हू-हू-हू.......

- स्टाॅप इट। इडियट।

रात में सचमुच जाग उठा था जैसे शाहदेव मैंशन। अगल-बगल के कमरों में सोये थे जोनाथन और शांभवी। अभी शायद आँख लगी ही थी कि ओम फट स्वाहा, चामुंडाय बिच्चै ... की ध्वनि के साथ जाग गये दोनों। बीच-बीच में जैसे किसी के गोंगियाने की आवाज - किसी गूंगे का गला दबाया जा रहा हो जैसे। साथ ही किसी स्त्री की दबे स्वर की रूलाई-अग्रेंजी में जोर-जोर से बोले जा रहे नाटक के संवाद। शांभवी ने जरा ध्यान से सुना - ओ! शेक्सपियर! - किंग लियर नाटक के संवाद! 

- हाऊ शार्पर दैन ए सर्पेंट्स टूथ इट इज/टू हैव ए थैंकलेस चाइल्ड, अवे! अवे! 

दोनों डरकर एक ही कमरे में आ गये। तरह-तरह की ध्वनियों से गूँज रहा था शाहदेव मैंशन। तीनखंडी मैंशन के बीचवाले खंड में उनके कमरों के कारण दोनों तरफ से आ रही थी आवाजें। जोनाथन ने कैमरा उठा लिया था। नाइट मोड में सेट कर रहा था। सामने वाले खंड की ओर दबे पांव बढ़ा। शांभवी भी चल पड़ी पीछे-पीछे कमरे में अकेले रहने की साहस नहीं जुटा पा रही थी। लंबी बारादरी पार करते ही किंगलियर के संवाद तेज हो गये थे। कमरे में बड़ा अद्भुत दृश्य था। दरवाजे की फाँक से, कैमरे की आँख से देख रहे थे दोनों।

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